चीन के पास कोरोना से भी घातक जैविक हथियार!

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कोरोना चीन का घातक जैविक हथियार है जो उसके बुहान स्थित हाइटेक प्रयोगशाला से लीक हो गया है। उसने ऐसे 40 से अधिक जैविक हथियार बना रखे हैं जिनका अमेरिका और यूरोप के खिलाफ इस्तेमाल किया जाना है। कोरोना वायरस की उत्पत्ति के बारे में कुछ चौंकाने वाली सूचनाओं का खुलासा हुआ है। इसी कारण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे चीनी वायरस करार दिया है जिससे चीन को मिर्ची लगी है। मुख्यधारा के अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने उन सूचनाओं को दबा दिया है जिनसे स्पष्ट होता है कि यह कोई अचानक पैदा हुई महामारी नहीं है। इस वायरस को कनाडा के लेबोरेटरी से चुराकर बुहान की प्रयोगशाला में मारक हथियार के रूप में विकसित किया गया है। पिछले वर्ष एक संदिग्ध समुद्री जहाज में कनाडा के लेबोरेटरी में कार्यरत चीनी वैज्ञानिकों ने तस्करी के जरिए चीन के बुहान में पहुंचाया था। ग्रेट गेम इंडिया के अनुसंधान में यह बात सामने आई कि इसमें चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम से जुड़े एजेंटों का हाथ था। चीन के वैज्ञानिकों ने वुहान स्थित प्रयोगशाला में उसे जैविक हथियार में बदला और उसी के लीक होने से दुनिया के 187 देशों में तबाही मची है। कोरोना के जैविक हथियार होने से संबंधित रिपोर्ट के आने के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारी विवाद हुआ। इसके बाद मेनस्ट्रीम मीडिया के एक हिस्से ने इसे जानबूझकर दबा दिया।

कोरोना वायरस के इतिहास के संबंध में जानकारी मिली है कि 13 जून 2012 को सऊदी अरबिया के जेदाह स्थित एक निजी अस्पताल में एक 60 वर्षीय मरीज भर्ती हुआ था जो 7 दिनों से बुखार, कफ और सांस की बीमारी से पीड़ित था। उसे ह्रदय, फेफड़े अथवा किडनी की कोई बीमारी पहले से नहीं थी। उसे धूम्रपान की लत भी नहीं थी।

मिश्र के वायरस चिकित्सक डा. अली मुहम्मद जकी ने उसे आइसोलेशन वार्ड में डाला और उसके फेफड़े से एक अज्ञात वायरस बरामद किया। उसकी पहचान के लिए डा.जकी ने नीदरलैंड के रोटरडम स्थित इरसमस मेडिकल सेंटर के विख्यात वायरलोजिस्ट रॉन फाउचर से संपर्क किया। उन्होंने विस्तृत जांच के बाद इसे मानव के लिए घातक कोरोना वायरस करार दिया। डा. रॉन फाउचर के जरिए इस वायरस का नमूना कनाडा के माइक्रो बायोलॉजी लेबोरेटरी के निदेशक डा. फ्रैंक प्लमर को मिला। चीन के एजेंटों ने वहीं से इस वायरस को चुरा लिया और तस्करी के जरिए बुहान ले गए। हाल में डा. फ्रैंक प्लमर की अफ्रीका में रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गई। इससे मामला और संदिग्ध हो गया।

डच लेबोरेटरी से कनाडा के लेबोरेटरी को इस वायरस का नमूना 4 मई 2013 को प्राप्त हुआ था। कनाडा में इसे संग्रहित और विकसित किया गया। वायरल रोगों की पड़ताल में इसका इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों ने विभिन्न पशुओं की प्रजातियों पर इसके असर का अध्ययन किया। कनाडा की खाद्य जांच एजेंसी की राष्ट्रीय प्रयोगशाला में इसपर शोध किया गया। कनाडा के माइक्रो वायोलॉजी प्रयोगशाला में लंबे समय से कोरोना वायरस समूह पर शोध किया जा रहा था। वर्ष 2004 में इसने कोरोना वायरस एनएल 63 की पहचान की थी। जुलाई 2019 को चीनी वैज्ञानिक दंपत्ति कनाडा से इस वायरस को चुराकर चीन ले गई। कनाडा की नेशनल माइक्रो बायोल़ॉजी लेबोरेटरी उत्तरी अमेरिकी की वायरल बीमारियों की शोध करने वाली एकमात्र सक्षम लेबोरेटरी है। इसने इबोला, सार्स जैसे संक्रामक वायरस का इलाज ढूंढने में सफलता पाई है। वायरस चुराने की आरोपी जियांगू क्यु कनाडा की प्रयोगशाला में वैक्सिन विभाग की हेड थी। माना जाता है कि वह चीन के जैविक युद्ध कार्यक्रम की एजेंट थी। उसका पति भी उसके विभाग में ही कार्यरत था। उसने कनाडा की प्रयोगशाला में शोध छात्रों के रूप में बहुत सारे चीनी जैविक युद्ध कार्यक्रम से जुड़े लोगों को इबोला वायरस पर शोध के नाम पर जुटा रखा था। अब कनाडा की जांच एजेंसियां यह अनुसंधान कर रही हैं कि 2006 से 2918 के बीच चीन तक कौन-कौन से वायरस और कौन-कौन सी तकनीक तस्करी के जरिए पहुंचाई गईं।

जानकारी मिली है कि डा. जिवोंगो क्यु ने 2017-18 के शैक्षणिक वर्ष में कम से कम पांच बार बुवान की नेशनल बायोसेफ्टी लेबोरेटरी का दौरा किया था। यह लेबोरेटरी बुहान के समुद्री जीवों की मंडी से 20 मील की दूरी पर है और कोरोना वायरस का विस्फोट वहीं से हुआ था। माना जा रहा है कि चीन का बायोलॉजिकल वारफेयर प्रोग्राम काफी आगे निकल चुका है। उसने काफी रासायनिक और जैविक हथियार बना रखे है। उसमें राकेट्स, एरियल बम, स्प्रेयर और कम दूरी के बॉलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं। 2016 में चीन ने राष्ट्रीय जीन बैंक का लोकार्पण किया जो विश्व का सबसे बड़ा जीन डाटा बैंक माना जा रहा है।

यह सब अचानक नहीं हुआ। इसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी। आज से दो दशक पहले चीन के रक्षामंत्री जेनरल ची हायोटियन का एक गोपनीय भाषण लीक हुआ है जिसे उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हार्डकोर नेताओं को संबोधित करते हुए रखा था। इसमें उन्होंने चीन के तीन प्रमुख मुद्दों की चर्चा की थी। पहला मुद्दा था जनसंख्या विस्फोट के कारण पर्यावरण का क्षरण, दूसरा मुद्दा था नए भूखंडों की तलाश कर नए उपनिवेशों में आबादी का स्थानांतरण और तीसरा मुद्दा था अमेरिका। उन्होंने यूरोपीय देशों को चीन का रणनीतिक शत्रु करार दिया था। उनका मानना था कि अमेरिका चीन के विस्तार में सबसे बड़ा रोड़ा है। उन्होंने कहा था कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ परमाणु युद्ध लड़ना मूर्खता होगी। इसके लिए जैविक हथियारों का इस्तेमाल बेहतर होगा। उन्होंने अमेरिका को साफ करने के लिए जैविक हथियार को सबसे महत्वपूर्ण करार दिया था।

बायोलॉजिकल विपन्स एंटी टेरोरिज्म एक्ट 1989 के लिपिकार डा. फ्रांसिस बोयले ने जियोपाल्टिक्स एंड इंपायर को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि कोरोना वायरस एक जैविक हथियार है और विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी इसकी जानकारी है। बुहान के जिस लेबोरेटरी से इसका प्रसार हुआ है वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की अवधारणा के अनुरूप निर्मित हुआ था।

कुल मिलाकर यह स्पष्ट हो चुका है कि यह वायरस चीन का जैविक हथियार है जो लीक हो गया है। इसके जरिए चीन अपनी आबादी को भी नियंत्रित करने की और अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के अलावा पूरी दुनिया पर अपना दबदबा कायम करने की योजना है। कोरोना के प्रकोप के थमने के बाद उसके जैविक और सासायनिक हथियारों को नष्ट करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने की जरूरत है अन्यथा अपने स्वार्थ के लिए वह पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है।

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