अमेरिकी चुनाव में ट्रंप की हार का मतलब!

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की हार और जो वाइडन की जीत हो चुकी है। इसे दक्षिणपंथी राजनीति के दौर की समाप्ति के रूप में देखा जा रहा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाउडी मोदी और नमस्ते ट्रंप का इवेंट आयोजित कर प्रवासी भारतीयों को ट्रंप के पक्ष में मतदान करने का आह्वान किया था। लेकिन इसका अमेरिकी चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में हाउडी मोदी के कार्यक्रम में अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा लगाकर आए थे। नियमतः किसी देश की दलगत राजनीति और चुनावों में सीधे तौर पर दखल देने की परंपरा नहीं है। नरेंद्र मोदी को यह भ्रम हो गया था कि वे जादूगर हैं और उनके नाम पर वोट गिरते हैं। यह भ्रम कई राज्यों के चुनाव में टूट चुका है लेकिन मोदी जी के मन में बरकरार है। अगर वे राजनेता होते तो दूसरे देश के नेता का इस तरह खुलकर प्रचार नहीं करते। वे भूल गए कि कूटनीतिक संबंध दो व्यक्तियों या दो दलों के बीच नहीं बल्कि दो राष्ट्रों के बीच बनते और बिगड़ते हैं। सत्ता बदलने का विदेश नीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन मोदी जी मन की बात करते हैं और मनमाने तरीके से काम करते हैं। वे ट्रंप के प्रचारक बनकर एक बड़ी चूक कर चुके हैं। इसका भुगतान किसी न किसी रूप में करना पड़ेगा। 2016 में जब अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप जीते तो वैश्विक स्तर पर दक्षिणपंथ की हवा चलने लगी और अल्पसंख्यक विरोध तेज़ हो गया। चाहे वे मुस्लिम हों या काले लोग सब के सब सत्ता के निशाने पर आने लगे। भारत में भी मोदी सरकार को नफरत की राजनीति फैलाने की प्रेरणा मिली। अब जो वाइडन की सरकार इस तरह की राजनीति को बढ़ावा नहीं देगी। अपनी जीत के एलान के साथ ही उन्होंने यह घोषणा कर दी कि सभी को साथ लेकर चलेंगे।

जाहिर है कि जो वाइडन राष्ट्रपति बनने के बाद मोदी जी से खुश तो नहीं ही होंगे। कूटनीतिक भाषा और होती है लेकिन कहीं न कहीं उनके मन में एक गांठ तो बनी रहेगी। जरूरी नहीं कि वे अपनी नाराजगी का उस भाषा में इजहार करें जिस भाषा में टीम मोदी करती है। मोदी जी की भाषा कूटनीतिक नहीं है। जो वाइडन ट्रंप अथवा मोदी जी की तरह बड़बोले नेता नहीं हैं। असली राजनेता कभी अपनी पसंदगी और नापसंदगी का अहसास नहीं होने देते। अपनी बातें खुलकर रखते हैं। लेकिन अपने नीतिगत फैसलों से अपनी बात कहते हैं। वे किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को बख्शते नहीं। जो वाइडन कई कारणों से भारत के खिलाफ नहीं भी जाएं तो नरेंद्र मोदी को अपने रडार पर निश्चित रूप से रखेंगे। गुजरात दंगे में मोदी जी की भूमिका को लेकर वे पूर्व में कटु आलोचना कर चुके हैं। अब उनके मन में क्या है कोई नहीं जानता। वे मध्यमार्गी विचारधारा के नेता हैं। दक्षिणपंथी विचारधारा के खिलाफ रहे हैं। भारत में धर्म के नाम पर जो नफरत का जो माहौल बनाया गया है उसे वे कभी भी पसंद नहीं करेंगे। जब वे दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन जाएंगे तो दुनिया को अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करेंगे। भारत पर भी उसकी निगाह होगी। उस समय नरेंद्र मोदी क्या करेंगे। वे भारत के सबसे अच्छे मित्र रहे रूस को नाराज कर चुके हैं। चीन और पाकिस्तान तो भारत के पारंपरिक विरोधी हैं हीं। अमेरिका में भी ऐसी सरकार बन गई जो उनकी विचारधारा को पसंद नहीं करती। मोदी सरकार का कार्यकाल अभी साढ़े तीन साल बचा हुआ है। हमारे संबंध तमाम पड़ोसी देशों से खराब हो चुके हैं। अधिकांश छोटे पड़ोसी देश चीन की शरण में जा चुके हैं। ट्रंप के कार्यकाल में जो रक्षा समझौते हुए हैं जो वाइडन उसमें क्या बदलाव लाएंगे अभी कहा नहीं जा सकता। निश्चित रूप से पाकिस्तान के प्रति भी उनका रवैया अपेक्षाकृत नरम रहेगा। चीन और पाकिस्तान के खिलाफ जंग की सूरत में वे भारत की कितनी मदद करेंगे कहना मुश्किल है।

भारत की अर्थव्यवस्था माइनस 24 प्रतिशत जीडीपी पर चल रही है। सरकार आत्मनिर्भर भारत का नारा दे रही है। पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बात कर रही है लेकिन इसकी जगह लोगों को सरकार और चंद पूंजीपति घरानों पर निर्भरता की ओर धकेल रही है। देश के अंदर अशांति और उपद्रव का माहौल बनाकर विदेशी निवेश को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। पूंजी के विकेंद्रीकरण की जगह उसे चंद हाथों में समेट देने की कोशिश कर रही है। महंगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा आदि मुद्दों पर सरकार न कोई बात कर रही है न सुनने को तैयार है। इस सरकार के कार्यकाल में अनुत्पादक मदों में खूब खर्च किया गया है और उत्पादक खर्चों में कटौती की गई है। एक व्यक्ति केंद्रित शासन व्यवस्था कायम की गई जिसमें किसी को सवाल पूछने की इजाजत नहीं। विशेषज्ञों से सलाह मश्विरा किए बिना बड़े-बड़े फैसले लिए जाते रहे जो अंततः विनाशकारी साबित हुए। दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकतों में अमेरिका, चीन, रूस आदि हैं। उनमें से आज की तारीख में सिर्फ अमेरिका के साथ अच्छे संबंध हैं। आगे रहेंगे या नहीं, पता नहीं। दक्षिणपंथ की हवा खराब हो चुकी है। इस बात को अगर मोदी जी समझ लेंगे तो अपनी नीतियों में बदलाव लाने का प्रयास करेंगे। भारत के अंदर भी बिहार ने जो संदेश दिया है उसे अगर नहीं समझेंगे तो मार्गदर्शक मंडल की ओर बढ़ते हुए अपने कदमों को रोक नहीं सकेंगे। उनका समय खत्म हो चुका है।

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